प्राण रोवेंगे मगर आना नहीं आंसू बहाने।
जा रहा हूँ मैं अकेला,
छोड़ कर संबल तुम्हारा।
पहुँच पाऊँगा जहाँ तक,
ढूँढ लूँगा मैं किनारा।
पर कहीं यदि याद आयी मीत तेरे साथ की तो।
झपकती पलकें उठा कर तुम न फ़िर जगाने।।
अंत तक बढ़ता चलूँगा,
साँस का लेकर सहारा।
मधुर दिन की याद होगी,
प्रीत का होगा इशारा।
पर जो थक कर, चूर होकर, रात में मैं ढुलक जाऊं।
मन की पीढा जागती होगी न आना तुम सुलाने॥
देख पाओगे मगर क्या,
मीत मेरे अंत को भी?
सर मेरा पत्थर पर होगा,
घास की बिस्तर बनेगी।
चू पड़ेंगे निलय के कुछ फूल पंखुरीहीन होकर।
पहन लूँगा मैं कफ़न आना नहीं अंजलि चढाने॥