प्रीत करूँ यह रीति नहीं क्या?
शलभ प्राण की पीड़ा लेकर,
भाव-कुभाव सभी सहता है।
शिखा विचारी ज्वाला पूरित,
ज़रा न उसका वश चलता है।
रोकर, हंस कर गले मिले तो,
प्राण गँवाए, जी जलता है।
कौन कहे यह प्रेम-मिलन है,
जग में इसकी रीति नहीं क्या?
प्रीत करूँ यह रीति नहीं क्या?
गुन-गुन कर भौंरा आता है,
मधुर पवन कुछ कह जाता है।
कलियों के मन के सब सपने,
कैसे रुके, छलक जाता है।
बुझती किसकी प्यास अरे,
मन की तृष्णा बाक़ी है।
बिखर गए सौरभ पांखुर सब,
कलियों की यह जीत रही क्या?
प्रीत करूँ यह रीति नही क्या?
सागर के भीतर हलचल है,
सरिता भी प्यासी की प्यासी।
वह तो बढ़ कर राह बनाता,
वह काले कोसों से आती।
किंतु मिलन के मधुर क्षणों में,
जलधारा यह बिखर गयी क्यों?
सागर भी सिमटा जाता है,
दोनों पर यह बीत रही क्या?
प्रीत करूँ यह रीति नहीं क्या?